गुरुवार, 26 नवंबर 2009

झूठ

मेरे एक मित्र ने एक बार मुझसे पूंछा था की हम झूठ क्यों बोलते है ! तो मैंने उन्हें ये कविता लिह कर भेजी थी ! मै इस कविता को यहाँ लिख रहा हूँ! इस कविता के बारे में आप अपने सुरम्ब विचार अवश्य अंकित करें !





झूठ हमारा नहीं हमारे पूर्वजो का संस्कार है

जनता, नेता, अभिनेता सबको यह स्वीकार है !

झूठ बोले बिना आजकल गाडी नहीं चलती है

झूठ बोलने से कभी-कभी सफलता भी मिलती है !

जो जितना ज्यादा झूठ बोलता है वो उतना ज्यादा पाता है

इतिहास उठा कर देख लो सच बोलने वाला पत्थर ही खता है !

अजीब विडंबना है ये, की आजकल सच्चे का मुह काला है

सबको पाता की झूठे का बोल बाला है !

झूठ तो कुछ है ही नहीं, जहां तक मुझको ज्ञान है

ये मै नहीं कहता कहते वेद पुराण है !

"सर्व खल्विदं ब्रह्म" छान्दोग्योप्निशत का यह मन्त्र है एक

सच और झूठ की लड़ाई अब मुझसे नहीं जाती देख !

जो होता है वो होने दो मेरा यह विचार है

झूठ हमारा नहीं पूर्वजों का संस्कार है !

10 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ...एकदम सत्य कथन। साधुवाद।

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  2. झूठ हमारा नहीं हमारे पूर्वजो का संस्कार है

    जनता, नेता, अभिनेता सबको यह स्वीकार है !
    सच है जैसा बीज बो ओगे वैसा ही काटोगे सुन्दर रचना शुभकामनायें

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  3. झूठे का बोलबाला सच्चे का मुह काला

    बहुत खूब रचना बधाई

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  4. अगर तूफ़ान में जिद है ... वह रुकेगा नही तो मुझे भी रोकने का नशा चढा है ।

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  5. हूँ....पूर्वजों के संस्कार आपने अपनाये की नहीं ......!?!

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  6. झूठ पर यह एक अच्छी कविता है । राजेश जोशी की " झूठ एक बाजे की तरह बजता था " कविता कहीं मिले तो पढें ।

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  7. theek kaha .jhoothey ka bolbala sachchey ka........!

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