शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गर्मी




जालिम है लू जानलेवा है ये गर्मी

काबिले तारीफ़ है विद्दुत विभाग की बेशर्मी

तड़प रहे है पशु पक्षी, तृष्णा से निकल रही जान

सूख रहे जल श्रोत, फिर भी हम है, निस्फिक्र अनजान

न लगती गर्मी, न सूखते जल श्रोत, मिलती वायु स्वक्ष

गर न काटे होते हमने वृक्ष

लुटी हजारों खुशियाँ, राख हुए कई खलिहान

डराता रहता सबको, मौसम विभाग का अनुमान

अपना है क्या, बैठ कर एसी, कूलर,पंखे के नीचे गप्पे लड़ाते हैं

सोंचों क्या हाल होगा उनका, जो खेतों खलिहानों में दिन बिताते है

अब मत कहना लगती है गर्मी, कुछ तो करो लाज दिखाओ शर्मी

जाकर पूंछो किसी किसान से क्या है गर्मी

4 टिप्‍पणियां:

  1. कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

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  2. भीषण गर्मी से पशु पक्षी मानव सभी त्रस्त है,बढ़िया रचना

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  3. sahi kaha yahan to 1 ghamnte ki bhi katauti ho to aasman sir pe utha lete hai...par bechare unka kya jinke ghar bulb to hai par kabhi chamakte nahi...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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