बुधवार, 19 मई 2010

क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

जो उचित नहीं है हर जगह वो काम हो रहा है

कल तक था जिसपर सबको भरोसा

आज वही बेवजह बदनाम हो रहा है

होना था जिस काम को परदे में

पता नहीं क्यों सरेआम हो रहा है

दुनिया में बढ़ रही है आबादी इस कदर

जमी को छोडिये, अजी आसमां नीलाम हो रहा है

बईमानी और घूसखोरी की चल पड़ी प्रथा ऐसी

जो जितना बदनाम है, उसका उतना नाम हो रहा है

कही मर रहे है भूख से लोग

तो किसी के यहाँ खा पीकर आराम हो रहा है

झूठ बोलना पाप है इतना तो सुना था

क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया किया जो आपने लिखना बंद कर दिया।।

    वाह क्या दुनिया रंग दिखा रही है,
    जिसे लिखना चाहिए वही दरकिनार हो रहा है,
    दूर की यात्रावाली नाव पर सवार हो रहा है,
    अरे भाई न लिखने का कारण तो बता जाते,
    इस भावुक दिल को तो समझा जाते,
    जाना ही था तो चुपके से चले जाते,
    हमें गिलवा नहीं होती,
    पर अब तो वे जानेवाले बता दे अपने जाने का कारण।।

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  2. मैं समझता हूँ कि आपने यह निर्णय भावना में आ कर लिया है, परन्तु ज्यादा दिन तक इस निर्णय को निभा नहीं पायेंगें । आपके अंदर का कवि आपको ऐसा करने ही नहीं देगा । मेरे विचार आपका यह निर्णय आपकी हार का प्रतीक है । फिर से विचार करें ।

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  3. aapne bahut badhiya likha to hai!
    sabhi aapke na likhne wali baate kyo kar rahe hai...?

    kunwar ji,

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अपना अमूल्य समय निकालने के लिए धन्यवाद
क्रप्या दोबारा पधारे ! आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं !