गुरुवार, 1 जुलाई 2010

भारतीय दल प्रणाली में सुधार आवश्यक ! santosh kumar "pyasa"

किसी भी अन्य समय एवं देश की तुलना में आज भारत की दलीय व्यवस्था में अधिक अस्पष्टता, अधिक अनिश्चितता और अधिक जटिलता की स्थिति है ! आज जनता के बहुत बड़े भाग में सभी राजनीतिक दलों के प्रति घोर निराशा की भावना व्याप्त है अ


इस स्थिति को भारतीय जन की ओर से सभी राजनीतिक दलों विशेषतया: सबसे प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस को गंभीर चेतावनी समझा जाना चाहिए !

देश की जनता का बड़ा भाग इस विचार को अपना रहा है की बार-बार चुनावों की स्थिति लोकतान्त्रिक व्यवस्था और देश हित में नहीं है ! राजनीतिक स्थायित्व बहुत आवश्यक है, तथा इसके लिए सभी संवैधानिक, संस्थात्मक और राजनीतिक प्रयत्न किये जाने आवश्यक है ! इस उद्देश्य से दलीय प्रणाली के दोषों के दूर करने और दल-बदल प्रणाली पर रोक लगाने के लिए सन १९८५ में भारतीय संविधान में ५२ वाँ संवैधानिक संशोधन कर दल-बदल प्रणाली पर रोक लगा दे गई थी ! आज इस कानून को दोबारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य घोषित किया जाना चाहिए ! राजनीतिक सथायित्व की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या को भी सिमित किया जाना चाहिए ! आज राजनीतिक पार्टियों का गठन करना "पान की दुकान खोलने जैसा हो गया है",! किसी राजनीतिक दल के नेता में मतभेद हुआ तो वह अगले दिन अपने दल के गठन की घोषणा कर देता है जोकि स्वस्थ जनतंत्र के लिए उचित नहीं है !इस तरह के बरसाती दलों के गठन से भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद इत्यादि प्रकार की बुराइयाँ जन्म लेती है !

भारत की दलीय प्रणाली को दोषमुक्त करने हेतु १९८५ के संशोधन द्वारा निर्मित कानून को दोबारा लागु किया जाना आवश्यक है ! यदि संभव हो तो सर्वोच्च न्यायालय को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए की देश में केवल दो ही दल हो, एक सत्ता पर आसीन रहे और दूसरा विपक्ष में बैठ कर उसके कार्यों का निरिक्षण करें !

3 टिप्‍पणियां:

अपना अमूल्य समय निकालने के लिए धन्यवाद
क्रप्या दोबारा पधारे ! आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं !