बुधवार, 10 अगस्त 2011

स्नेह सुरभि {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"


अलमस्त हो जाय प्रभा की मधुर बेला
छेड़ दो वो प्रीत-गीत फिर से विहाग
मिटें  निज मन के मनभेद सभी
देश-काल, अन्तराल का भेद मिटाने को
हे सरित सुनाओ राग
अज्ञान तिमिर सब हिय से मिट जाय
बस संचारित हो तो स्नेह सौहार्द और मोह
मधुप की मधुर गुन-गुन सुनकर
कटे जन्म-जन्मातर के के विछोह
जगे अन्तरम में इक ललक ऐसी
विजय-मार्ग रोके न भय, कभी बन कारा
सुकर्म कर रचे नवयुग ऐसा
स्नेह सुरभि से सुवासित हो जग-सारा  
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चे मन की सच्ची कामना - शुभ आशीष

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  2. सुन्दर रचना , आभार .

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

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