सोमवार, 10 सितंबर 2012

ज़िन्दगी कब जी मैंने? {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

(छवि गूगल से साभार)
ज़िन्दगी जीते-जीते आया एक अजनबी खयाल
क्या कभी ज़िन्दगी जी मैंने? कौंधा ये सवाल
हरपल  रहा  बस  सुनहले  ख्वाबों  में  खोया
 रचा निज विचारो का संसार, कभी हंसा तो कभी रोया
निष्फिक्र होकर, बन विक्रम, बचपन बिताया
न जाने कब फिर मैं "किशोर कुल" में आया
अभी भी ज़िन्दगी से दूर खोया रहा किताबों में
कभी अन्वेषक तो कभी जनसेवक, रोज बनता मैं ख्वाबों में
यूँ ही फिर एक दिन, दिल के किसी कोने में कोई फूल खिला
कोई अजनबी लगा आने ख्वाबों में, हुआ शुरू ये सिलसिला
फिर क्या आरज़ू जगी दिल में , तड़प ने उससे मिलवाया
फिर उदित हुआ नव भ्रम रवि, लगा जैसे मैं सब कुछ  पाया
       मित्र-मस्ती, चहल-पहल-, प्रेमिका-और-प्यार
       इन्ही में कुछ पल टिका रहा मेरा जीवन संसार
         अभी भी दूर था , मुझसे-मुझतक का फासला  
      अभी भी न मिटा ज़िन्दगी और मेरे बीच का फासला
फिर ज़िन्दगी कुछ आगे चली, फिर आया एक मोड़
    फिक्र-ऐ-रोजगार में आया सबकुछ पीछे छोड़
    जब खाईं ठोकरें तो हुआ वास्तविकता का कुछ बोध
कुछ-हद तक पहचाना ज़िन्दगी को, चाहा करना इसपर शोध
  पर समय कहाँ ठहरा ? जीवन चक्र चलता रहा निरंतर
बस यूँही घटता-बड़ता रहा ज़िन्दगी और मेरे बीच का अंतर....("प्यासा")

शनिवार, 17 मार्च 2012

दिल को बहलाना सीख लिया {ग़ज़ल} सन्तोष कुमार "प्यासा"


जबसे तेरी यादों में दिल को बहलाना सीख लिया 
हमने मुहब्बत में खोकर भी पाना सीख लिया 
जब धड़कन-२ भीगी गम से, सांसे भी चुभने लगी 
दर्द की चिंगारी को बुझाने के लिए आंसू बहाना सीख लिया
तरसी-२ प्यासी-२ भटकती हैं मेरी नजरें इधर उधर 
जबसे तेरी आँखों ने संयत अदा में शर्मना सीख लिया
जबसे तेरे शहर में, तेरे इश्क में बदनाम हम हुए 
समझ गए ज़माने की अदा, दिल से दिल की बातें छुपाना सीख लिया
पन्नो में लिपटे, मुरझाए गुलाब की खुश्बू से सीखकर 
हमने ज़िन्दगी में खुद लुटकर सबको हँसाना सीख लिया 

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

जिंदगी चली (ग़ज़ल) संतोष "प्यासा"



कुछ इस दिलकश ढंग से मेरी ज़िन्दगी चली
मंजिल की तलाश में उम्र भर भटका इस उस गली
इक खामोश दर्द की तड़प में गुजरे है दिन
कभी तन्हाई तो कभी  रुशवाई में मेरी शाम ढली
न पूंछ  तू,  कि मेरे अकेलेपन की दास्ताँ क्या थी
मुझे तो रंगीं महफ़िलो में भी तेरी कमी खली
वक़्त ने कुछ यूँ सितम ढाया है मुझपर
रोशन होने से पहले बुझ गई, जो कभी चाहत कि शमा जली
जब भी मुस्कुराने कि खता मैंने कि है
रूठ गई हंसी मुझसे , देनी पड़ी खुशियों की बली

रविवार, 11 दिसंबर 2011

तब तो सिर्फ प्याज महँगी थी... सन्तोष कुमार "प्यासा"





आपको याद होगा कुछ साल पहले जब अटल जी प्रधानमंत्री पद पर कार्यरत थे, तब प्याज की महंगाई से सारा देश आक्रोशित था, अपोजिशन ने उस समय खूब उछल कूद की थी, सरकार पर दूरदर्शिता की समझ
न होने का आरोप लगाया था, हड़ताल, बंदी जैसी न जाने कितनी ही प्रकार की गतिविधियों का हुजूम देश भर में उमड़ पड़ा था ! यु० पी० ए० ने दहाड़-२ कर कहा था की अगर वो (य़ू० पी० ए०) सत्ता पर होते तो देश को ये दिन नहीं देखना पड़ता! लेकिन आज जब य़ू० पी० ए० सत्ता पर आई तो उसने तो पहले से बदतर दिन दिखा दिए ! अरे पहले तो सिर्फ प्याज ही मंहगी हई थी, पर आज क्या मंहगा नहीं है, खाने से लेकर यातायात, शिक्षा आदि समस्त क्षेत्रों में मह्नागाई उछाल मार रही है ! अब शायद सत्ता के सारथियों को यह मंहगाई नहीं दिख रही है ! क्या बड़े-२ बोल वचन सिर्फ कुर्सी हथियाने के लिए किये थे ? आखिर कहाँ गई वो दूरदर्शिता ? कहाँ कहाँ गया वो अर्थशास्त्र का ज्ञान ? कहाँ गई वह व्यवस्थित राजनीती प्रणाली की समझ ? जिसकी गाथा गाते नहीं थकते थे आप ! अरे जनाब मंहगाई तो क्या आप तो  देश में अशांति और आतंकवाद को भी विस्तृत होने से नहीं रोक पा रहे है ! पहले कम से कम देश में शांति तो कायम थी ! अगर तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो स्पस्ट होता है की जब अटल जी सत्ता पर देश उस समय देश में अधिक शांति थी ! आज भारत और पाक को एक सूत्र में बांधने का कार्य जो बस कर रही है वह भी अटल जी की ह़ी देन है ! "पोखरण परिक्षण" भी अटल जी की वजह से संभव हुआ !

लेकिन य़ू० पी० ए० ने देश को कभी "राष्ट्रमंडल खेलो में धांधली, तो कभी टू जी स्पेक्ट्रम का गड़बड़ घोटाला, कभी अलगाववाद से सुलगती हुई घाटी और नक्सलवाद के आलावा दिया ह़ी क्या है ?  अरे जनाब दूसरे पर उंगली उठाना बहुत आसान है, जरा अपनी गिरेबान पर भी झांक कर देखिए !

रविवार, 6 नवंबर 2011

दिल बेक़रार क्यूँ हूँ {ग़ज़ल} सन्तोष कुमार "प्यासा"


लुट गया है सब कुछ,अब भला ये दिल बेक़रार क्यूँ  हैं
ऐ सितमगर तुझसे अबतलक मुझको प्यार क्यूँ  हैं
जब भी धड्कीं हैं ये, कोई नया गम दे गई मुझको
दिल की धडकनों पर भला अब भी मुझको एतबार क्यूँ हैं
जिसका आना नहीं मुमकिन  वापस लौट कर
न जाने उस इक पल का मुझको इंतजार क्यूँ हूँ
निगाहें तो कर चुकीं कब का इजहारे इश्क मुझसे
खुदा जाने तेरे लबों पर अबतलक इंकार क्यूँ हैं

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

सिलसिला सवालातों का {ग़ज़ल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

इक नजर भर देख लूँ तुझे, अब वक़्त कहाँ है बातों का
 जिस्म से रूह हो रही जुदा, उजड़ा मौसम मुलाकातों का
क्या बयां करूँ हालत-ए-दिल, अब भला क्या आरजू करूँ
 इश्क की रहो राहों में निकल रहा   जनाजा मेरे जज्बातों का
रोशन है दिलकश शमा हर तरफ, पर बुझ गया है दिल
शायद यही है तक़दीर मेरी, शिकवा करूँ तो किससे इन हालातों का
जवाबों-तलब की राहों में भटकते रहे हम उम्र भर
कुछ यूँ रहा है ज़िन्दगी में सिलसिला सवालातों का
{मानवीय संवेदनाओ को समझना वाकई मुश्किल है, कभी-२ दिल और दिमाग परस्पर विरोधी हो जाते है, मेरे मष्तिष्क के अन्तरम में उपरोक्त पंकितियों का कोई भाव  नहीं है, और न ही कोई विशेष कारण ही जिससे की मै ऐसी रचना लिख सकूँ, पर शायद दिल ने जरुर ऐसा कुछ महसूस किया है जिसे दिमाग अभी तक समझ नहीं पाया! }

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

किसलय सी कोमल काया {गीत} सन्तोष कुमार "प्यासा"


क्यूँ विकल हुआ हिय मेरा
क्यूँ लगते सब दिन फीके
हर छिन कैसी टीस उठे
अब साथ जागूं रजनी के
जब से वह किसलय सी
कोमल काया मेरे मन में छाई
संयोग कहूँ या प्रारब्ध इसे मैं
वो पावन पेम मिलन था इक पल का
मिटीजन्मो की तृष्णा सारी
इक स्वप्न सजा सजल सा
इस सुने से जीवन में मेरे
मचली प्रेम तरुणाई
जब से वह किसलय सी
कोमल काया मेरे मन में छाई
न परिचित मै नाम से उसके
न देश ही उसका ज्ञात है
पर मै मिलता हर दिन उससे
वोतो मनोरम गुलाबी प्रातः  है
निखरा तन-मन मेरा बसंत बहार जैसे
ये कैसी चली पुरवाई 
जब से वह किसलय सी
कोमल काया मेरे मन में छाई

शनिवार, 10 सितंबर 2011

बदल गया है देश {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

 छवि गूगल से साभार

 
भला विचारा कभी,
हम क्या थे और क्या हो गये
स्वार्थ की प्रतिस्पर्धा ऐसी जगी
परहित भूल, अलमस्त हो खो गये !
न फिक्र की समाज की,
किसी के दुःख से न रहा कोई वास्ता
फंसकर छल कपट के जुन्गल में
बहाया अपनों का लहू, चुना बर्बादी का रास्ता
तिल भर सौहार्द न बचा ह्रदय  में
भला किसने रचा ये परिवेश
तुम खुद बदल गये हो
और कहते हो बदल गया है देश !
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मनुष्य सदैव से अपनी गलतियों को छुपाने के लिए दूसरों पर दोषारोपण करता आया है,
परन्तु वर्तमान की आवश्यकता गलतियों  का परित्याग एवं विकाशन है, किन्तु ये विडम्बना ही है की वो इस वास्तविकता का साक्षात्कार करने से स्वयं को बचा रहा है !

 
 
 

बुधवार, 10 अगस्त 2011

स्नेह सुरभि {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"


अलमस्त हो जाय प्रभा की मधुर बेला
छेड़ दो वो प्रीत-गीत फिर से विहाग
मिटें  निज मन के मनभेद सभी
देश-काल, अन्तराल का भेद मिटाने को
हे सरित सुनाओ राग
अज्ञान तिमिर सब हिय से मिट जाय
बस संचारित हो तो स्नेह सौहार्द और मोह
मधुप की मधुर गुन-गुन सुनकर
कटे जन्म-जन्मातर के के विछोह
जगे अन्तरम में इक ललक ऐसी
विजय-मार्ग रोके न भय, कभी बन कारा
सुकर्म कर रचे नवयुग ऐसा
स्नेह सुरभि से सुवासित हो जग-सारा  
 

रविवार, 24 जुलाई 2011

बेनूर चाँद {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"



















एक दर्द में फिर डूबी शमा, फिर चाँद हुआ बेनूर
बिखरा दिल, टीसती यादें तेरी भला क्यूँ हुए तुम दूर
करूँ वक़्त से शिकवा या फिर अफ़सोस अपनी किस्मत पर 
तरसती "प्यास" में तडपूं हर पल, ऐसा चढ़ा उस साकी का सुरूर 
ये कशिश है इश्क की या दीवानगी का कोई दिलकश सबब
तडपती जुदाई उसी को क्यूँ , जो होता प्यार में बेकसूर 
हजारों तारों के साथ भी आसमां क्यूँ हुआ तनहा
जब बंद हो गईं आंखे चकोर की, चाँद भी हो गया बेनूर 
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मन के अन्तरम में पता नहीं कैसी टीस कैसी बेचैनी उठी,
फिर न चाहते हुए/ न जानते हुए भी इन पंक्तियों को  और क्यूँ  कैसे
शब्दों में पिरोया मैंने, मै खुद नहीं  समझ सका  !

शनिवार, 28 मई 2011

सुहानी साँझ {गीत} सन्तोष कुमार "प्यासा"


प्रखर होने लगी हिय उत्कंठा
आलोकित हुई सुप्त उमंग
तट पर लहरें खेले जैसे
मन में उठे वही तरंग
रोम-रोम हुआ स्पंदित
महक उठी तरुनाई
फिर सुहानी साँझ आई
उठी मचल स्म्रतियां फिर से
बज उठे ह्रदय के तार-तार
ये प्रीत धुन छेड़ी किसने
सजीव हो उठे आसार
विस्तृत होने लगी सुवासित सुरभि
मन में ये किसकी, धुंधली
छवि सी छाई
फिर सुहानी साँझ आई
बस एक आस लिए मै, काटूं पल-पल
प्रतीक्षा का यह अनंत काल घोर
विस्मृत भी कर सकता कैसे?
तुम चाँद तो मै चकोर
बह चली अश्रु सरित, होंठो में घुला विषाद
धरा में मनोरम मौन-वीणा छाई
फिर सुहानी साँझ आई...




मंगलवार, 17 मई 2011

कशिश {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"


उसके पंजों में महज
 एक तिनका नहीं है,
और न ही उसकी चोंच में
एक चावल का दाना
वो तो पंजो में साधे
हुए है एक
सम्पूर्ण संसार,
उसकी चोंच में है
 एक कर्तब्य
एक स्नेहिल दुलार...
ये पर्वत शिखा से
निर्झरिणी का प्रवाह
महज एक
वैज्ञानिक कारण नहीं है,
और न ही
कोई संयोग,
ये तो धरा की तड़प,
और जीवन की प्यास
करती है इसे
पर्वताम्बर, से
उतरने को बेकल...
ये खिलती कलियाँ,
निखरती सुरप्रभा
सरकती,महकती
यूँ ही नहीं
मन को हर्षाते
संध्या की मौन वीणा
मचलती चांदनी
यूँ ही नहीं
प्रेमीयुगल की
उत्कंठा बढ़ाते...
ये बदलो के उस छोर
नित्य सूर्य का उगना, ढलना
महज एक प्राकृतिक नियम नहीं है,
ये सब तो
उर की उत्कंठा,
अनुरक्ति की देन है...
ये अलौकिक शक्ति है
प्रीत की,
एक मनोरम अभिव्यक्ति है
मिलन के रीत की....